Friday, August 22, 2014

जब तक पति पत्‍नी के बीच विश्‍वास नहीं होगा, जीवन में टकराव होते रहेंगे । समपर्ण की भावना ही दोनों को एक कर सकती है । युवतियों को अपने पति के परिवारजनों के प्रति रुचि लेनी चाहिए । यह सच है कि हमारे समाज की कुछ इस प्रकार संरचना है कि स्‍त्री को ज्‍यादा जिम्‍मेदारियां दी जाती हैं । यदि वह अपनी जिम्‍मेदारियों को पूरा कर लेती है तो उसे बहुत सम्‍मान मिलता है ।


यह अजीब दास्‍तां है कि एक स्‍त्री जब मां बनती है तो वह अपने पुत्र से बेहद प्रेम करती है । नौ माह तक अपने गर्भ में रखकर अपना भोजन खिलाती है और तब मां का खून पुत्र का खून बन जाता है । मां अपने बच्‍चे को पालती पोसती है और उसके प्रति बंध जाती है । बच्‍चा बडा हो जाता है । मां का प्‍यार धीरे धीरे कम होता जाता है । बच्‍चा बडा हो ता है तो मां अपने बच्‍चे को डांटती भी है । पीटती भी है और प्‍यार भी करती है । बच्‍चे की बडी आयु के लिए ईश्‍वर से प्रार्थना भी करती है । बच्‍चा धीरे धीरे बडा होता है तो वह अपने बच्‍चे से बहुत सी आशाएं रखती है । वह चाहती है कि उसे जो कहा जाए, वह वैसा ही करे । उसे जिस चीज से रोका जाए उसमें वह चीज में कोई रुचि न ले । लेकिन होता है विपरीत । जब तक बच्‍चा छोटा होता है वह अपनी मां का हर कहा मानता है । लेकिन जैसे जैसे उसकी बुदिध का विकास होता है, बच्‍चा अपनी समझ के मुताबिक काम करता है । तब स्थिति विडम्‍बनापूर्ण हो जाती है । मां अपने में पक्ष में और पुत्र अपने पक्ष में तर्क देते हैं । तब मां अपने बच्‍चे से नफरत करने लगती है । तब मां का नफरतभरा चेहरा देखकर बच्‍चा भी अपने बीच विवदास्‍पद स्थिति पाता है । वह मां का कहना मानना तो चाहता है किन्‍कतु अपनी समझ के मुताबिक भी चलना चाहता है । जब दोनों के विचार भिन्‍न होते हैं तो स्थिति बदतर होती जाती है । तब मां सोचती है – बेटा बदल गया है । बेटा भूल गया है मां के प्रति अपने फर्ज को । इधर बेटा सोचता है – मां बदल गई है । पहले कितना प्‍यार करती थी, कितना चाहती थी, अब इतनी नफरत । मां सोचती है बेटा बदल गया है । मां एक दोहरेपन के भाव में व्‍यवहार करती है, इधर बेटा भी । मां बेट की शादी भी करना चाहती है, लेकिन अपनी मर्जी के अनुसार । बेटा अपनी मर्जी चाहता है । पुन विचारों का तकराव । तत्‍पश्‍चात एक पक्ष बात को मान लेता है । पुत्र का विवाह हो जाता है । अब प्रेम की यात्रा आगे बढती है । पुत्र अपनी पत्‍नी से प्रेम करता है । मां इस सत्‍य को स्‍वीकार नहीं कर पाती । वह अपने भावों द्वारा बाधा उत्‍पन्‍न करती है । पत्‍नी यह सब स्‍वीकार नहीं कर पाती । फलत सास बहू में झगडा शुरु हो जाता है । ****


दो व्‍यक्तियों के संबंध अवश्‍य ही विषाद रुप उत्‍पन्‍न करते हैं । यदि दोनों ही इस सत्‍य को स्‍वीकार कर चलें तो दुख व विषाद की मात्रा कुछ कम हो सकती है । संबंधों की जितनी ज्‍यादा प्रगाढता होगी, जितनी ज्‍यादा निकटता होगी उतने ही ज्‍यादा संबंध कटुता से भरे होंगे । जहां दो व्‍यक्तियों के बीच निकट संबंध होने पर अधिक प्रेम, अधिक सहयोग,अधिक अपनापन दिखता है, वह कटुता भी उसी मात्रा में होती है । खूनी रिश्‍तों के बीच भी कटुता पैदा होती है । संबंध कृत्रिमता से भरे भी होते हैं । संबंधों का अर्थ है एक समझौता । सबंधों की प्रगाढता के बीच कोई स्‍थायित्‍व नहीं होता, कोई गारन्‍टी नहीं होती । स्‍थायी कहे जानेवाले संबंध भी एक ही झटके में टूटकर बिखर जाते हैं । एक ही पल में प्रेम घृणा में बदल जाती है और घृणा प्रेम में । संबंधों के बीच एक ही चीज महत्‍वपूर्ण होती है और वह है स्‍वार्थपरता । हर कोई कहीं न कहीं आधारिक रुप से स्‍वार्थी होता है । यह दूसरी बात है कि स्‍वार्थ में गुणवता और मात्रा में अंतर हो । दो व्‍यक्तियों के बीच जो संबंध हैं हो सकता है उनमें फर्ज, करुणा के नाम देकर संबंधों की पवित्रता को बनाए रखने के लिए प्रयास करता हो व दूसरा भले ही कम समझकर संबंधों को जारी रखता हो लेकिन इतना तो स्‍पष्‍अ है कि ऐसे संबंध एक ही झटके में टूटने की भी क्षमता रखते हैं । भले ही प्रंत्‍यक्ष रुप से संबंध न टूटें । संबंधों के बीच दीवारे और दरारे आ जाती हैं । पवित्रता और प्रेम का दावा करने वाला भी अपवित्रता और घृणा से भर उठता है । क्‍या संबंधों की प्रगाढता हमेशा दुखदायी होती है ? क्‍या हर संबंध के बीच स्‍वार्थपरता होती है ? क्‍या संबंधों के बीच से निस्‍वार्थ भावना उत्‍पन्‍न नहीं हो सकती ? क्‍या संबंधों में प्रेम और घृणा दोनों ही तत्‍व नहीं होते ? यह कैसे किस तरह कहा जा सकता है कि संबंध स्‍वार्थपरता से भरे हुए होते हैं ? क्‍या संबंध नहीं होने चाहिए ? स्‍वच्‍छ भावना से प्रेरित संबंध कैसे बनाए जा सकते हैं ? बहुत से प्रश्‍न हैं जिनका उत्‍तर खोजना होगा हर किसी को । *****


पहले आकषर्ण, फ्‍रि बातचीत,फ्‍रि मुलाकातोंका सिलसिला और फ्‍रि बढता प्रेम और उसके बाद मधुर यादें और फ्‍रि मस्तिष्‍क में एक चित्र और फ्‍रि ह्दय में याद और फ्‍रि ह्दय में एक चित्र और फ्‍रि जीवनभर एक होने की कल्‍पना । जीवन भर साथ रहने का अर्थ है – विवाह । यानि प्रेम विवाह । यह सब होता है स्‍वाभाविक और निरन्‍तर । विवाह के लिए निर्णय अपना होते हुए भी मां बाप का निर्णय जरुरी समझा जाता है । उनकी स्‍वीकृति मिली तो सब कुछ, किन्‍तु उनकी स्‍वीकृति न होने पर एक प्रश्‍नचिन्‍ह खडा हो जाता है । अब क्‍या करें । जिद । अपनी बात पर अटल रहकर । मनाने की भरपूर कोशिश । हर तरह के प्रयास । आखिरी दम तक । बाहरी सभी झूठी मान्‍यताओं का कडा विरोध । संघर्ष । अपनी सामाजिक मर्यादा के बीच । एक एक सीढी और फ्‍रि मंजिल पर । दो तरीके हैं – एक एक सीढी चढेंगे या फ्‍रि लिफट के रास्‍ते से । एक दो मिनट में ही मंजिल पर । हां, लिफट की लाइट नहीं जानी चाहिए । एक एक सीढी चढने से देर भले ही हो, लेकिन मंजिल पर अवश्‍य पहुंचा जा सकता है । हां, पावों में भी दम होना चाहिए । अपने अन्‍दर साहस होना चाहिए ।


समझ की कमी और अंहकार



पारिवारिक झ्‍गडे होते हैं समझ की कमी और अंहकार की वजह से । समझ्‍ की कमी जहां झगडे का कारण्‍ बनता है वहां अंहकार उस झ्‍गडे को और आगे बढाता है । एक के कहे गए कुछ शब्‍द पसन्‍द नहीं आते दूसरा तुरन्‍त झगडा करने पर उतारु हो जाता है । सभी अपने को दोष न देकर दूसरे को दोषी मानते हैं । जब तक जीवन में ध्‍यान नहीं घटता ऐसी स्थिति बनी रहती है । अत- जरुरत है ध्‍यान की । यदि ध्‍यान और मौन में रहने का प्रयास किया जाए तो हम अंहकार और परेशानी से दूर हो सकते हैं ।

बच्‍चे कहना नहीं मानते



अनुभव बताता है कि कोई भी किसी की भी बात सुनने को तैयार नहीं होता । हर व्‍यक्ति अपने को बेहद समझदार समझता है । कुछ लोग तो अपने को प्रक्टिकल होने का दावा करते हैं । वैसे यह सत्‍य है कि जहां दावा किया जाता है वहां कहीं न कहीं कमजोरी अवश्‍य होती है । हर व्‍यक्ति  गलतियों से भरा होता है और वह तभी दूसरे की बात मानने को तैयार होता है जब पहले उसे कुछ महत्‍व दिया जाए अथवा उसकी सोच का समर्थन किया जाए । बिना जरुरत के किसी को कोई सलाह दी जाए तो वह उसका महत्‍व नहीं समझता । यहीं कारण है कि बच्‍चे हमारा कहना नहीं मानते । माता पिता अपना अनुभव थोपते रहते है । बच्‍चे अपने अनुभव से सीखना चाहते हैं । होना तो यह चाहिए कि व्‍यक्ति जीवन की सभी अच्‍छी और महत्‍व की बातों को सुने और पढे और समय आने पर उनका उपयोग करे । लेकिन ज्‍यादातर लोग जब सिर पर आ पडती है तब उन बातों का हल खोजते हैं । कई लोग तो अपना नुकसान करके सीखते है ।

बदलाव बुरा नहीं होता



परिस्थितियां आदमी को बदलती रहती हैं । जो आज ठीक लग रहता है हो सकता है कल गलत लगे और इसी प्रकार जो आज गलत लग रहा है हो सकता है कल ठीक लगे । बदलाव बुरा नहीं होता लेकिन बदलाव रचनात्‍मक होना चाहिए । कई बार हम लोग देखते हैं कि कई बार परिस्थितिवश लोग उलटी सोच में नाकारात्‍मक सोच वाले बन जाते है और नकारात्‍मक सोच से व्‍यक्ति का अपना ज्‍यादा नुकसान होता है दूसरे का कम ।